न्यूज़ फ्लैश
BIG BREAKING:: हिमालयी आपदाओं से निपटने में AI बनेगा बड़ा हथियार, जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच सतत विकास का खाका तैयार करने पर जोर BIG BREAKING:: बर्नीगाड़ को धामी की बड़ी सौगात, ₹217 करोड़ के विकास कार्यों का तोहफा, डिग्री कॉलेज शुरू और मिनी स्टेडियम की घोषणा BIG BREAKING:: डिग्री कॉलेजों के निर्माण में देरी पर मुख्य सचिव आनन्द बर्द्धन सख्त, हर जिले में बनेंगे कंप्यूटर आधारित प्रतियोगी परीक्षा केंद्र! BIG BREAKING:: मदन कौशिक ने छात्राओं को दिया स्वच्छता का संदेश, ज्वालापुर कन्या इंटर कॉलेज को सोलर हैंडपंप और मंच शेड की सौगात BIG BREAKING:: हाथियों के आतंक से फसलें बर्बाद, विधायक आदेश चौहान ने किया निरीक्षण, किसानों को मुआवजा और सुरक्षा के दिए सख्त निर्देश BIG BREAKING:: धामी ने 63 मेधावी सितारों और 6 प्रधानाचार्यों को किया सम्मानित, बोले—यही हैं उत्तराखंड के उज्ज्वल भविष्य की मजबूत नींव!
Home » मंथन » “हिमालय की ढलानों पर मंथन, आपदा से सुरक्षित विकास का महासंकल्प देहरादून में देश-विदेश के वैज्ञानिक एक मंच पर, भूस्खलन न्यूनीकरण की वैश्विक रणनीति पर पांच दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का भव्य शुभारंभ”

“हिमालय की ढलानों पर मंथन, आपदा से सुरक्षित विकास का महासंकल्प देहरादून में देश-विदेश के वैज्ञानिक एक मंच पर, भूस्खलन न्यूनीकरण की वैश्विक रणनीति पर पांच दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कार्यशाला का भव्य शुभारंभ”

(शहजाद अली हरिद्वार)देहरादून। हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते भूस्खलन जोखिम और सुरक्षित विकास की चुनौती को ध्यान में रखते हुए उत्तराखण्ड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र द्वारा हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र में आपदा-सक्षम विकास विषय पर आयोजित पांच दिवसीय अंतरराष्ट्रीय तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रम का सोमवार को शुभारंभ किया गया। यह कार्यक्रम 02 फरवरी से 06 फरवरी 2026 तक पंडित दीनदयाल उपाध्याय प्रशिक्षण एवं वित्तीय प्रशासन अनुसंधान संस्थान, सुद्धोवाला, देहरादून में आयोजित किया जा रहा है।

कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए सचिव, आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र भूगर्भीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील है, जहां भूस्खलन, भारी वर्षा और भूकंपीय गतिविधियों के कारण निरंतर खतरा बना रहता है। उन्होंने कहा कि इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के माध्यम से हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन की प्रक्रियाओं और जोखिम को वैज्ञानिक रूप से समझने, सुरक्षित और टिकाऊ अवसंरचना विकसित करने तथा सड़कों, पुलों और जलापूर्ति जैसी महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं के लिए दीर्घकालिक और लचीले इंजीनियरिंग समाधान अपनाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। विनोद कुमार सुमन ने कहा कि कार्यक्रम का उद्देश्य विभिन्न विभागों और संस्थानों की तकनीकी क्षमता को मजबूत करना, जोखिम आकलन की प्रक्रियाओं में सुधार लाना और आपदा के बाद पुनर्बहाली तंत्र को अधिक प्रभावी बनाना है।

नॉर्वे के भू-तकनीकी अनुसंधान संस्थान के विशेषज्ञों द्वारा हिमालयी परिस्थितियों के अनुरूप ढलान स्थिरता, मृदा सुदृढ़ीकरण, सॉइल नेलिंग, जल निकासी उपायों तथा उपग्रह आधारित तकनीकों के माध्यम से जोखिम मानचित्रण पर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इस अवसर पर भूस्खलन विशेषज्ञ डॉ. हाकोन हेयर्डल ने कहा कि हिमालय जैसे संवेदनशील पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन का स्वरूप लगातार बदलता रहता है, ऐसे में वैज्ञानिक अध्ययन, बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणाली और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुभव साझा करना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि दीर्घकालिक साझेदारी के माध्यम से ही हिमालयी क्षेत्रों में सुरक्षित विकास संभव है। बता दें कि डॉ. हकोन हेयर्डल ने दुनिया भर से 32 वर्षों की भूस्खलन विशेषज्ञता और बड़े भूस्खलन जोखिम मानचित्रण और न्यूनीकरण परियोजनाओं का नेतृत्व किया है।

ALSO READ  "आपदा पर अब नहीं होगी देरी! सेना और यूएसडीएमए ने मिलाया दम, गोल्डन ऑवर में होगा सबसे तेज़ रेस्क्यू ऑपरेशन"

विश्व बैंक के प्रतिनिधि अनुप करण्थ ने कहा कि हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को देखते हुए उत्तराखण्ड में आपदा जोखिम न्यूनीकरण और आपदा तैयारी पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि वर्ष 2013 की आपदा के बाद राज्य में आपदा पुनर्बहाली, जोखिम प्रबंधन और संस्थागत क्षमता निर्माण के लिए निरंतर सहयोग किया जा रहा है। प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत प्रतिभागियों द्वारा हरिद्वार स्थित मनसा देवी भूस्खलन क्षेत्र का क्षेत्रीय भ्रमण किया गया, जहां वास्तविक हिमालयी परिस्थितियों के आधार पर जोखिम विश्लेषण, न्यूनीकरण उपायों और स्थानीय स्तर पर प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणालियों का व्यावहारिक अध्ययन कराया गया।

कार्यशाला में यूएलएमएमसी के निदेशक डाॅ. शांतनु सरकार, यूएसडीएमए के संयुक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी मो0 ओबैदुल्लाह अंसारी, यूएलएमएमसी के प्रमुख सलाहकर डाॅ. मोहित पूनिया आदि उपस्थित रहे। कार्यशाला में नेपाल एवं भूटान के तकनीकी विशेषज्ञों के साथ ही भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, भारतीय सुदूर संवेदन संस्थान, उत्तराखण्ड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र, यूप्रिपेयर परियोजना, उत्तराखण्ड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण, लोक निर्माण विभाग, सिंचाई विभाग के अधिकारियों एवं तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा प्रतिभाग किया जा रहा है।

 

कार्यक्रम के प्रमुख उद्देश्य

ऽ हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन के कारणों और जोखिम को बेहतर ढंग से समझना।

ऽ रेखीय विभागों के अधिकारियों और विशेषज्ञों की क्षमता बढ़ाना।

ऽ भूस्खलन जोखिम न्यूनीकरण के लिए मानकीकृत और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाना।

ऽ विभिन्न संस्थानों के बीच अनुभव साझा करना और आपसी सहयोग को बढ़ावा देना।

ऽ राज्य एवं विभागीय स्तर पर आपदा जोखिम प्रबंधन की क्षमता को मजबूत करना।

ऽ लोक निर्माण विभाग सहित रेखीय विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना।

ALSO READ  "मोदी सरकार की उपलब्धियों पर मंथन, रानीपुर के प्रबुद्ध वर्ग ने भरी हुंकार—‘विकसित भारत’ के सपने को साकार करने में निभाएंगे अहम भूमिका"

ऽ सड़कों, पुलों और जलापूर्ति प्रणालियों के लिए सुरक्षित एवं टिकाऊ डिजाइन को प्रोत्साहित करना।

ऽ ढलान स्थिरता, मृदा सुदृढ़ीकरण, सॉइल नेलिंग, जल निकासी जैसे उपायों की जानकारी देना।

ऽ उपग्रह आधारित तकनीकों और भू-स्थानिक आंकड़ों के उपयोग को बढ़ावा देना।

ऽ स्थानीय स्तर पर प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणाली और समुदाय की भागीदारी सुनिश्चित करना।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

[democracy id="1"]

Our Visitor

5 8 9 5 9 1
Users Today : 616
Users Yesterday : 496
[democracy id="1"]

Our Visitor

5 8 9 5 9 1
Users Today : 616
Users Yesterday : 496