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“हरियाणा के डीजीपी ओपी सिंह का सख्त संदेश: पुलिस अफसरों की ‘बड़ी टेबल–तौलिया संस्कृति’ खत्म करो, जनता से जुड़ो नहीं तो हटो!”

(शहजाद अली हरिद्वार)चंडीगढ़। सरकारी दफ्तर लोगों के पैसे से बना है। यह उनकी सहायता और उनके समस्या के समाधान के लिए है, सत्ता प्रदर्शन के लिए नहीं। पब्लिक-डीलिंग एक फाइन आर्ट है। इसका संबंध आपके ऑफिस डिज़ाइन, सॉफ्ट-स्किल और प्रबंधन क्षमता से है।

सबसे पहले अपने ऑफिस के टेबल का साइज छोटा करें। अपनी और विजिटर्स की कुर्सी एक जैसी करें। अपनी कुर्सी पर तौलिए के इस्तेमाल कतई न करें। इसका कोई तुक नहीं है। अगर आपके ऑफिस में कोई कॉन्फ्रेंस हॉल है तो विजिटर्स को वहाँ बैठाएँ। अगर नहीं है तो अपने ऑफिस के एक बड़े साइज के कमरे को विजिटर्स रूम बनायें। वहाँ प्रेमचंद, दिनकर, रेणु जैसे साहित्यकारों की किताबें रखें। एक व्यवहार-कुशल पुलिसकर्मी को नियुक्त करें जो उनसे उनके आने के उद्देश्य और समस्या के बारे में बात कर सके।

जब कोई व्यक्ति शिकायत लेकर आता है तो उनके मोबाइल को खुद से दूर रखें, उनकी बात ध्यान-पूर्वक सुनें। एक सप्ताह में तीन में से कोई एक कार्रवाई अवश्य करें: (१) यदि मामला आपराधिक हो तो मुकदमा दर्ज करें; (२) यदि सिविल नेचर का हो, तो सीएम विंडो में भेजें; (३) यदि शिकायत झूठी हो, तो रोजनामचे में दर्ज कर उनकी प्रति शिकायतकर्ता को दें।

जो पुलिसकर्मी जनता के साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर पा रहे हैं, उन्हें सुधारें या फिर ऐसी जिम्मेदारी से हटा दें। बढ़ई को हलवाई का काम देने में कोई बुद्धिमानी नहीं है। याद रखें, पुलिस एक बल है और सेवा भी। आप एक तार हैं जिसमें बिजली का करंट दौड़ रहा है। लोगों को आपसे कनेक्शन चाहिए, रोशनी चाहिए — झटका बेशक दें, लेकिन यह उन्हें दें जो लोग का खून चूसते हैं…

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